नहीं पहले मूवी देखेंगे फिर खाना खायेंगे
अरे यार घर में कर लेते हैं ना अच्छी सी पार्टी
,,
सुबह से ही घर मे कोलाहल हो रहा था और सुनयना मंद मंद मुस्कुराए जा रही थी और विवेक भी अखबार पढ़ते हुए मुस्कुराते देख लेते थे लेकिन उनकी दिलचस्पी अखबार की सुर्खियों मे ही ज्यादा थी
आज सुनयना और विवेक की शादी की २५ वीं वर्षगांठ थी
,, कोई कही नहीं जा रहा , सुनयना ने सबको मुस्कुराते हुए शांत करते हुए कहा,,
ये पार्टी हम संडे को रख लेंगे, जैसे तुम लोग कहोगे लेकिन आज हमारा वही प्रोग्राम रहेगा जो हमेशा रहता है
क्या ! आज भी , बेटे मोहित ने रूठते हुए कहा
चलिए ठीक है, आज आप लोग जाइए हम सब फिर चले चलेंगे, बेटी नैना ने गले लिपट के कहा
नैना और मोहित फिर कुछ बातों और संडे की योजना बनाने में व्यस्त हो गए और सुनयना रसोई में चल दी,, कचौरी बनाने ,जो विवेक और बच्चों का मनपसंद नाश्ता था।
विवेक तैयार होकर बाहर सुनयना का इंतज़ार कर रहे थे,, हल्की गुलाबी साड़ी और खुले बालों में सुनयना बहुत सुंदर लग रही थी, विवेक की आंखों में प्रशंसा का भाव था पर वो व्यक्त नहीं कर पाए हमेशा की तरह,
विवेक के दिल मे हमेशा सुनयना के प्रति एक सम्मान रहा, जिस तरह से उसने सारी बातों के बावजूद उसका साथ दिया और परिवार संभाला बिना कोई शिकायत किए..
खूबसूरत रास्तों से होते हुए कार पहाड़ी पर पहुंच गई, जहां विवेक मंदिर की तरफ चले गए और सुनयना उतर कर हमेशा की तरह किनारे पड़ी एक बेंच पर बैठ गई ,, उन तमाम यादों को समेटते हुए..जब उसकी और विवेक की शादी तय हुई थी और विवेक ने पहले ही अपनी और नेहा की सारी बातें उसे बता दी थीं,, यही वो जगह थी जहां विवेक और नेहा इसी दिन, इसी जगह मिले और बिछड़े भी,,
बिंदास और बेबाक नेहा पहली नज़र में ही शर्मीले विवेक के दिल में बस गई,, विपरीत स्वभाव और रहन-सहन के बावजूद दोनो एक दूसरे के प्रति कैसे आकर्षित हो गए, कोई नहीं जानता, समय के साथ नजदीकियां बढ़ने लगीं..और जब शादी की बात आई तो नेहा की शादी के बाद अलग रहने की बात सुन कर वो दंग रह गया,, वो जानता था कि नेहा बंदिशों में रहने वाली लड़की नहीं है लेकिन वो उसके मां से ही अलग कर देगी ऐसा सोचा नहीं था.. उन मां से जिसने उसके पिता के जाने के बाद पता नहीं कितनी मुश्किलों से पाला पढ़ाया
विवेक ने नेहा को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ रहा और फिर इसी जगह पर दोनों अंतिम बार मिले जहां नेहा ने उसकी दी अंगूठी वापस की,, कभी ना मिलने को कितनी आसानी से कहकर..
तभी से इस दिन वो यहां आते हैं अपने अतीत के साथ आज का दिन गुजारने,,
और सुनयना ने कभी ऐतराज नहीं किया लेकिन कभी-कभी वो सोचती है कि क्या ऐसा हमेशा ही रहेगा, क्या वो हमेशा ही अपनी शादी की सालगिरह ऐसे ही मनाएगी,, किसी तीसरे को आज के दिन अपनी ज़िंदगी के दिन याद करके,,
हांलकि विवेक फिर सबके अगले दिन सबके साथ मनाते हैं लेकिन आज का खास दिन तो ऐसे ही गुजरता है..
और आज २५ साल हो गए..सोचते हुए सुनयना की आंखे नम हो आईं
भारी मन लिए वो भी मन्दिर की तरफ चल पड़ी..
दूर से मन्दिर में थोड़ी चहल- पहल सी लगी,, कुछ सजा सा भी,, शायद शादी है किसी की,,
सरप्राइज़!!!
सुनयना जैसे ही मन्दिर की सीढियां चढ़ी तो मोहित, नैना और दोस्तो - रिश्तेदारों को देखकर एकदम चौंक गई..
कुछ समझ ही नहीं आया उसे
अरे! तुम सब लोग! यहां! कैसे??
अरे मम्मी आराम से ,, सब बताते हैं आपको
ये सब तो पापा का प्लान था, जिसमे हम लोगों ने थोड़ा तड़का लगाया है,, नैना ने मुस्कुराते हुए कहा,, और आज आप दोनों की फिर से शादी होगी यहां पर
सुनयना हतप्रभ सी रह गई, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था लेकिन सामने से मोहित को मुस्कुराते हुए आते देखकर उसकी आँखें भी ख़ुशी से झिलमिला उठीं
अरे मम्मी अभी तो विदा भी नहीं हुई और तुम रोने लगी,, मोहित ने शरारती अंदाज में कहा तो सब हँसने लगे
पण्डित जी के सामने बैठ कर जब विवेक ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो सुनयना उस स्पर्श में अपनापन पाकर पुलकित हो उठी
मुझे माफ कर दो सुनयना,, जो तुमने कभी गलती की ही नहीं उसकी सजा मैं तुमको देता रहा और तुम बिना कोई शिकायत किए ही मुझे सारी खुशियां देती रहीं, परिवार सजाती सवारंती रहीं,, मैं सच में बहुत खुशनसीब हूं जो तुम मुझे मिली और आज इस अग्नि के सामने मैं वादा करता हूं तुम्हे जीवन के और इस रिश्ते के सफ़र मे हर सुख और हमेशा साथ देने का,,
सुनयना की सुंदर सी आंखों मे किसी नवविवाहिता की तरह ही फिर सपने संवरने लगे थे।


