Saturday, 9 November 2024

रिश्ते का सफर

आज हम सब बढ़िया से होटल में खाना खाने चलेंगे,,
नहीं पहले मूवी देखेंगे फिर खाना खायेंगे
अरे यार घर में कर लेते हैं ना अच्छी सी पार्टी
,, 
सुबह से ही घर मे कोलाहल हो रहा था और सुनयना मंद मंद मुस्कुराए जा रही थी और विवेक भी अखबार पढ़ते हुए मुस्कुराते देख लेते थे लेकिन उनकी दिलचस्पी अखबार की सुर्खियों मे ही ज्यादा थी
आज सुनयना और विवेक की शादी की २५ वीं वर्षगांठ थी
,, कोई कही नहीं जा रहा , सुनयना ने सबको मुस्कुराते हुए शांत करते हुए कहा,,
ये पार्टी हम संडे को रख लेंगे, जैसे तुम लोग कहोगे लेकिन आज हमारा वही प्रोग्राम रहेगा जो हमेशा रहता है
क्या ! आज भी , बेटे मोहित ने रूठते हुए कहा
चलिए ठीक है, आज आप लोग जाइए हम सब फिर चले चलेंगे, बेटी नैना ने गले लिपट के कहा
नैना और मोहित फिर कुछ बातों और संडे की योजना बनाने में व्यस्त हो गए और सुनयना रसोई में चल दी,, कचौरी बनाने ,जो विवेक और बच्चों का मनपसंद नाश्ता था।
विवेक तैयार होकर बाहर सुनयना का इंतज़ार कर रहे थे,, हल्की गुलाबी साड़ी और खुले बालों में सुनयना बहुत सुंदर लग रही थी, विवेक की आंखों में प्रशंसा का भाव था पर वो व्यक्त नहीं कर पाए हमेशा की तरह,
विवेक के दिल मे हमेशा सुनयना के प्रति एक सम्मान रहा, जिस तरह से उसने सारी बातों के बावजूद उसका साथ दिया और परिवार संभाला बिना कोई शिकायत किए..
खूबसूरत रास्तों से होते हुए कार पहाड़ी पर पहुंच गई, जहां विवेक मंदिर की तरफ चले गए और सुनयना उतर कर हमेशा की तरह किनारे पड़ी एक बेंच पर बैठ गई ,, उन तमाम यादों को समेटते हुए..जब उसकी और विवेक की शादी तय हुई थी और विवेक ने पहले ही अपनी और नेहा की सारी बातें उसे बता दी थीं,, यही वो जगह थी जहां विवेक और नेहा इसी दिन, इसी जगह मिले और बिछड़े भी,,
बिंदास और बेबाक नेहा पहली नज़र में ही शर्मीले विवेक के दिल में बस गई,, विपरीत स्वभाव और रहन-सहन के बावजूद दोनो एक दूसरे के प्रति कैसे आकर्षित हो गए, कोई नहीं जानता, समय के साथ नजदीकियां बढ़ने लगीं..और जब शादी की बात आई तो नेहा की शादी के बाद अलग रहने की बात सुन कर वो दंग रह गया,, वो जानता था कि नेहा बंदिशों में रहने वाली लड़की नहीं है लेकिन वो उसके मां से ही अलग कर देगी ऐसा सोचा नहीं था.. उन मां से जिसने उसके पिता के जाने के बाद पता नहीं कितनी मुश्किलों से पाला पढ़ाया
विवेक ने नेहा को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ रहा और फिर इसी जगह पर दोनों अंतिम बार मिले जहां नेहा ने उसकी दी अंगूठी वापस की,, कभी ना मिलने को कितनी आसानी से कहकर..
तभी से इस दिन वो यहां आते हैं अपने अतीत के साथ आज का दिन गुजारने,,
और सुनयना ने कभी ऐतराज नहीं किया लेकिन कभी-कभी वो सोचती है कि क्या ऐसा हमेशा ही रहेगा, क्या वो हमेशा ही अपनी शादी की सालगिरह ऐसे ही मनाएगी,, किसी तीसरे को आज के दिन अपनी ज़िंदगी के दिन याद करके,, 
हांलकि विवेक फिर सबके अगले दिन सबके साथ मनाते हैं लेकिन आज का खास दिन तो ऐसे ही गुजरता है..
और आज २५ साल हो गए..सोचते हुए सुनयना की आंखे नम हो आईं 
भारी मन लिए वो भी मन्दिर की तरफ चल पड़ी.. 
दूर से मन्दिर में थोड़ी चहल- पहल सी लगी,, कुछ सजा सा भी,, शायद शादी है किसी की,,
सरप्राइज़!!! 
सुनयना जैसे ही मन्दिर की सीढियां चढ़ी तो मोहित, नैना और दोस्तो - रिश्तेदारों को देखकर एकदम चौंक गई..
कुछ समझ ही नहीं आया उसे
अरे! तुम सब लोग! यहां! कैसे?? 
अरे मम्मी आराम से ,, सब बताते हैं आपको
ये सब तो पापा का प्लान था, जिसमे हम लोगों ने थोड़ा तड़का लगाया है,, नैना ने मुस्कुराते हुए कहा,, और आज आप दोनों की फिर से शादी होगी यहां पर
सुनयना हतप्रभ सी रह गई, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था लेकिन सामने से मोहित को मुस्कुराते हुए आते देखकर उसकी आँखें भी ख़ुशी से झिलमिला उठीं
अरे मम्मी अभी तो विदा भी नहीं हुई और तुम रोने लगी,, मोहित ने शरारती अंदाज में कहा तो सब हँसने लगे 
पण्डित जी के सामने बैठ कर जब विवेक ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो सुनयना उस स्पर्श में अपनापन पाकर पुलकित हो उठी
मुझे माफ कर दो सुनयना,, जो तुमने कभी गलती की ही नहीं उसकी सजा मैं तुमको देता रहा और तुम बिना कोई शिकायत किए ही मुझे सारी खुशियां देती रहीं, परिवार सजाती सवारंती रहीं,, मैं सच में बहुत खुशनसीब हूं जो तुम मुझे मिली और आज इस अग्नि के सामने मैं वादा करता हूं तुम्हे जीवन के और इस रिश्ते के सफ़र मे हर सुख और हमेशा साथ देने का,,
सुनयना की सुंदर सी आंखों मे किसी नवविवाहिता की तरह ही फिर सपने संवरने लगे थे।

रबड़ी

दादी एक बात और बताऊं, कल तो पार्टी भी है घर में,,
नन्हे गोलू ने अपनी गोल-गोल आंखें नचाते हुए सुलेखा से कहा 
सुलेखा ऊपर ही ऊपर अपने पोते की बातों को हंसते हुए सुन रही थी लेकिन भीतर ही भीतर मन दुख और रुदन से भरा हुआ था
बेटे का आज प्रमोशन हुआ और कल पार्टी भी है लेकिन मुझे बताने की सुध भी नहीं आई किसी को,, अरे आशीर्वाद ही मिलता मेरा
दादी मैं जा रहा हूं खेलने
हां बेटा तू जा ,मैं भी आराम करूंगी
सुलेखा भी जैसे थक के बोली  
थक ही तो गई थी वह हर चीज से जैसे 
आंखें मूंदी तो नन्हा राजन सामने आ खड़ा हुआ 
अपने स्कूल की हर बात बताते हुए ,यही वह बेटा था जो दिन भर बोल बोल के उसकी जान खा जाता था और आज दो बातें भी बहुत सोच कर बोलता है और वह इंतजार करती रहती है कि उसका वही बचपन वाला बेटा फिर से सामने आ जाए 
मां!
दरवाजे पर राजन की दस्तक ने उसे यादों से जगा दिया,,
सो गई क्या?
अरे नहीं बेटा 
सुलेखा पुलक के बोली 
आखिर आ ही गया बताने ,मां हूं बिना बताए थोड़ी ना रह सकता है 
सुना तेरा प्रमोशन हो गया 
हां मां कल कागज मिल गया 
राजन ने पैर छूते हुए कहा 
सुलेखा को अब कोई शिकायत याद नहीं आ रही थी राजन के पैर छूते ही
अच्छा मां आराम करो, मैं बाद में आता हूं
राजन उठकर दरवाजे तक गया और रुक कर बोला 
मां कल एक छोटी सी पार्टी रखी है ऑफिस के लोगो की,, 
सुलेखा मुस्कुरा उठी 
अब वह शायद उसे सबसे मिलवाने को कहेगा 
मां तुम चाहो तो जीजी के यहां जा सकती हो ,थोड़ा शोर शराबा होगा देर तक ,तुम्हारी नींद खराब हो सकती है 
राजन ने थोड़ा हिचकते हुए कहा 
नहीं बेटा मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी ,मैं कमरा बंद करके आराम से सो जाऊंगी 
राजन ने चैन की सांस ली,, जैसे जो वह कह नहीं पा रहा था, उसने कह दिया हो,और बाहर निकल गया
सुलेखा का रुदन अब आंखों से बह चला था
पति के जाने के बाद अपने प्रति सब कुछ भूल कर कितनी मुश्किल‌ से उसने राजन को कैसे पढ़ाया लिखाया वहीं जानती है 
बचपन की हर छोटी से छोटी बात बताने वाला राजन कब उससे इतना दूर हो गया कि आज अपनी खुशियों में भी शामिल नहीं कर पा रहा था ,,उसे पता ही नहीं चला 
अगले दिन शाम को घर में अलग ही रौनक थी
दादी बहुत सारे पकवान बने हैं
गोलू जासूस बना सब खबरें दे रहा था और हां दादी आपकी मनपसंद रबड़ी भी आई है 
नन्हे गोलू को भी उसकी पसंद पता थी 
सुलेखा को रबड़ी बहुत प्रिय थी,, उसे याद आया कि कैसे वो बचपन में घर के सामने वाले काका की दुकान से लेकर गलियों में घूम घूम कर खाती थी
लेकिन अब सुलेखा जानती थी कि मीठा खाना मतलब घर में क्लेश को दावत देना है ,जब-जब थोड़ी सी भी कुछ मिठाई खाई है ,बहु चीख के पूरा घर सर पर उठा लेती है जैसे वह बहुत परवाह करती हो उसकी 
दादी तुम खाओगी रबड़ी?
क्या मेहमान चले गए गोलू ?
हां दादी ,,बस थोड़े बचे हैं 
ले आ
सुलेखा रबड़ी का स्वाद अपने होठों पर महसूस कर पा रही थी 
कटोरी उठाकर जैसे ही वह मुंह के पास लाई 
छन्न !!!
हाथ से कटोरी दूर फेंक दी गई ,
मीठा माना है लेकिन जुबान पर काबू नहीं,
बहू ने चिल्ला कर कहा ,,चाहती हो कि बीमार पड़ें और लोग कहें कि बेटे बहु ने देखभाल नहीं की,,
लोग खुले दरवाजे से देख रहे थे,, उसकी परवाह किए बिना ही वह बोलते जा रही थी 
और सुलेखा शर्मसार होकर हतप्रभ सी बस बैठी ही रही,, बहु गोलू को घसीटते हुए बाहर ले गई 
रात सुलेख की आंखों में नींद नहीं रुकी 
जीवन जीने का कोई उद्देश्य अब उसे नजर नहीं आ रहा था 
सच है कि बूढ़ा बच्चा समान हो जाता है ,क्या हो जाता अगर वह ना खाती तो  ,,लेकिन इतनी मीठे से वह मर भी तो नहीं जा रही थी 
सारा दुख, दर्द बनकर सुलेखा के सीने में उतर आया
उसने बेचैनी से इधर-उधर देखा ,,पलंग पर जरा सी रबड़ी गिरी पड़ी हुई थी ,,शायद कटोरी फेंकते समय गिर गई थी,, उसने अपनी उंगली से वह रबड़ी उठाई और जीभ पर रखी और असीम तृप्ति का अनुभव लेकर गहरी सांस लेकर लेट गई ,,,
...
राजन के घर पर आज फिर भीड़ थी 
मां की तेरहवीं थी 
बड़े अच्छे से भोज का आयोजन हुआ था 
सब गुण गाते थक नहीं रहे थे 
बच्चे हो तो ऐसे 
कोई बचा नहीं जिसे खाया ना हो 
भोजन भी एकदम स्वादिष्ट था ,,खास तौर पर रबड़ी,, जिसकी सब प्रशंसा कर रहे थे
" रबड़ी बहुत पसंद थी मां को ,,सब ने खाया, मांजी तृप्त हो गई होंगी "
बहू ने आंसू पोंछते हुए कहा।

Saturday, 2 September 2017

बादलों सी ख़्वाहिशें...
पता नही क्यूँ, चली आती हैं,
अचानक ही,,
बेमतलब सी, उड़ते हुए ..
और दे जाती हैं
एक नर्म छाँव,
धूप सी ज़िन्दगी में ..

Wednesday, 29 March 2017

दिन की खुरचन है शाम...

कोई कर्ज़ चढ़ा हुआ है शाम पर शायद
जाती धूप के कदमों तले बिछती है रोज़..

धूप के सफ़र में तमाम उम्र निकाल दी
इक शाम तेरी गली में गुज़ारने के लिए ..

दिन के उड़ते ख़्यालों की आवारगी
शाम की गली के नुक्कड़ पर जा रूकी ..

एक सूरज बसा हैं तेरी यादों के उजाले में,
मेरी शामों का रंग कभी ढलता नही है...

एक आवारा दिन को भी,
शाम खूबसूरत ही चाहिए ..

फटा-पुराना दिन ये
चाँद के पैबंद से ढाँक लें ..

उड़ गया था जो पंख फैलाए धूप तले
इंतज़ार में है घर उस परिंदे का शाम ढले...

चाँद का ज़मीं से फासला था बहुत
शाम ने झील में जब तक उतारा ना था...

इक इंतज़ार शाम की आँखों में,
चाँद को उतरना ही पड़ा आँगन में...

धूप की कमाई खर्च कर के,
शाम के लिए एक चाँद खरीदा है..



Tuesday, 28 March 2017

शब्द बन बह जाना


ठहरी हुई ख़ामोशी में,
जमने लगती है,
काई भी..

जरूरी है,
कभी-कभी..
निरन्तर चलते जाना..

जरूरी है,
कभी-कभी..
शोर मचाती भीड़ में..
शब्द बन,
बह जाना।

Thursday, 2 March 2017

बिखरते हुए रंग

Stories : First Winner

shikha story painting.jpg
बिखरते हुए रंगलेखिका : शिखा सक्सेना 

“चंदर फूलों का बेहद शौकीन था । सुबह घूमने के लिए उसने दरिया किनारे के बजाय अल्फ्रेड पार्क चुना था क्योंकि पानी की लहरों के बजाय उसे फूलों के बाग के रंग और सौरभ की लहरों से बेहद प्यार था और उसे दूसरा शौक था कि फूलों के पौधों के पास से गुजरते हुए हर फूल को समझने की कोशिश करना । अपनी नाजुक टहनियों पर हँसते-मुस्कुराते ये फूल जैसे अपने रंगो की बोली में आदमी से ज़िंदगी का जाने कौन-सा राज कहना चाहते हैं और ऐसा लगता है कि जैसे हर फूल के पास अपना व्यक्तित्व संदेश है जिसे वह अपने दिल की पंखुड़ियों में आहिस्ते से सहेज कर रखे हुए है कि कोई सुनने वाला मिले और वह अपनी दास्ताँ कह जाए ।
और वैसे भी आज चंदर का जी भी कुछ उदास सा था..और आज उसे लग रहा था कि कोई उसकी भी दास्तान सुने चुपचाप से, बिना कुछ कहे और इन फूलों से अच्छा और कौन हो सकता था
शादी का सारा उत्साह खो सा गया, सारी भावनाएँ पलट गई हो जैसे गौरी के लिए ..अगर ये बात पहले ही पता चल जाती तो ये शादी तो वो कभी ना करता और अब उसे गुस्सा आ रहा था
कुछ अनुमान तो उसे पहले ही दिन हो गया था लेकिन उसने उसे मायके से बिछोह का दुख ही समझा और आज सुबह गौरी के उठते ही उसने उसे अपने पास खींच कर बैठाना चाहा तो गौरी के धक्का देने पर हतप्रभ रह गया और उससे भी ज्यादा उसकी बातों से कि वो ये शादी चाहती ही नही थी बल्कि उसकी पहली पसंद इंदर था ..इंदर उसका छोटा भाई ..तो ये बात गौरी ने पहले क्यों ना बताई ..सोचते-सोचते सर में दर्द हो गया उसके और सुबह की चाय पिये बिना ही सैर पर निकल आया पार्क में
तो ये वजह थी गौरी के बार-बार घर आने की और उसने ये आकर्षण अपने लिए समझ लिया ..और वो भी तो कितना पसंद करने लगा था उसे ,एक नदी की तरह चंचल गौरी ..जिसके साथ वो बहना चाहता था
घर जाने का मन ना होने के बावजूद भी जाना पड़ा ..माँ ने सर सहलाते हुए सुबह चाय पिए बिना जाने की वजह पूछी तो मन किया फफक कर उनकी गोदी में रोने का लेकिन बड़े होना आपको संवेदनाओं को छुपाना सीखा देता है
लेकिन अब क्या? ऐसे तो वो ज़िंदगी गुज़ार ही नही सकता ..गौरी से बात करनी ही होगी उसे
“तुम ये बात पहले भी बता सकती थी” .. चंदर का स्वर शांत और ठंडा सा था
“हमारे घर में बड़ों की राय के आगे कोई कुछ नही कह सकता..”
“तो फिर मुझसे ही क्यों कहा” ..कहना चाह कर भी चंदर कह ना पाया
लेकिन एक दीवार सी खींच ली उसने अपने और गौरी के दरम्यान
हाँलकि ये दीवार कभी-कभी गौरी ने तोड़ने की उत्सुकता भी दिखाई लेकिन चंदर तो जैसे बिल्कुल ही भावहीन हो गया हो,
जो चीज हमारे पास हो उसकी कद्र नही रहती लेकिन जब वही दूर जाती दिखती है तो सारी अच्छाई नज़र आने लगती है ..गौरी को भी इंदर की जो बातें आकर्षक लगती थी अब उबाऊ सी लगने लगी ..हर लड़की से हंस कर बात करना तो उसकी आदत में ही था ..मुँह से लगी सिगरेट के उड़ते छल्ले अब उसे उसके अंदाज नही बुरे लगते थे ..लापरवाही और घर  के प्रति उसकी गैरजिम्मेदारी उसे भाते ना थे इसके विपरीत उसे चंदर में ये सारी खूबियाँ नज़र आने लगी थी ..उसकी इच्छा का मान रखते हुए उसने गौरी से दूरी बना रखी थी और अब गौरी को अपनी पसंद पर अफसोस और पिता की पसंद पर गर्व हो रहा था
ऑफिस में प्रमोशन के साथ ट्रांसफर के ऑफर को जो चंदर सिर्फ घर ना छोड़ने की वजह से ठुकरा चुका था वही जब इसके लिए तैयार हो गया तो बाॅस को बड़ा आश्चर्य हुआ और व्यंग्य से मुस्कुराते हुए बोले “”तो चंदर जी शादी के बाद आप भी अकेले ही रहना चाहते है”” चंदर बस मुस्कुरा कर रह गया..घर में बात पता चलते ही गौरी को लगा कि कैसे रहेगी वो चंदर के साथ और माँ को बड़ा दुख हुआ
“बेटा मुझे कम से कम तुमसे ऐसी उम्मीद नही थी..”
“नही माँ आप गलत समझ रही हो मैं अकेले ही जा रहा हूँ, गौरी यही रहेगी..”
“हैं!! तो क्या गौरी यहाँ अकेले रहेगी..”
“अकेली तो वहाँ पड़ जाएगी माँ, यहाँ तो आप सब हो अभी नई है ना..”
ओट में खड़ी गौरी को लगने लगा कि जैसे किसी भँवर में वो फँस चुकी है जिसका कोई किनारा नही है
“तुम चिंता मत करो मैं जाते ही तलाक के पेपर भिजवा दूँगा .. तुम पर कोई इल्ज़ाम नही आएगा..”
सुनकर दंग रह गई थी गौरी ..  चंदर अभी भी उसी की फिक्र कर रहा था
और आखिर चंदर पहुँच ही गया, अपनी नई जगह नया जीवन शुरू करने.. उस दिन सामान भी ना लगा पाया, शरीर से ज्यादा मन थका हुआ था ..क्या सोचा था और क्या हो गया, एक खालीपन सा जैसे आ गया हो जीवन में
फिर अगले दिन ऑफिस ..जो इतना बुरा भी नही था, लेकिन घर पहुंचकर बहुत अकेलापन लगा, पहली बार परिवार से अलग रहना .. बेमन से फिर सामान लगाना शुरू किया कि बैग में रखा एक गुलाबी पत्र मिला
चंदर,
कई बार हमें सतह के ऊपर की लहरें अच्छी लगती हैं पर बाद में पता चलता है कि समंदर की असली गहराई से उसका कोई संबंध नही ..मैं कितनी गलत हूँ इसका एहसास मुझे आपके जाने के ख्याल भर से हुआ .. मैं और क्या लिखूँ बस यही कि लहरों से हमें किनारे तो मिल जाते हैं लेकिन मैं समुंदर के दिल की गहराई में डूबना चाहती हूँ ।
पत्र पढ़ कर चंदर हल्का सा रुआंसा हो गया .. उसका मन हुआ की गौरी को डांटे कि ये सब क्या लगा रखा है .. लेकिन वो अन्दर से मुस्कराहट खुद से ज्यादा देर न छिपा सका ..और उसी समय अपने ऑफिस पत्र लिखने बैठ गया.. वापस उसी जगह भेजने के लिए .. फूलों के रंग उसकी ज़िंदगी में भी बिखरने लगे थे।


#आजसिरहाने के लिए

Saturday, 17 September 2016

इत्ता सा टुकड़ा चाँद का...

                       
चाँद की ठोकर लगी
सारे सितारे बिखर गए ...

महक रही भीनी खुश्बू सी
किसने लगाई रात के हाथों में चाँद-सितारों की मेंहदी सी....

धूप के बिखरे रंगों को बटोर के
चाँद की कटोरी से रात में उड़ेल दें....

बची धूप के टुकड़े चलो उठा लाएँ
चाँद की आरी से सितारे बनाकर आसमान में टाँक आएँ...

इक चाँद टाँग दो रोशनी के लिए
कि आसमां से भी ऊँचे ख़्वाब हैं मेरे..

चाँद के हाथों आसमां थमा गया
समुंदर पर सर रख सूरज सो गया...

चाँद- तारों की छत तले
चंद सपने टहलने चले