Saturday, 9 November 2024

रबड़ी

दादी एक बात और बताऊं, कल तो पार्टी भी है घर में,,
नन्हे गोलू ने अपनी गोल-गोल आंखें नचाते हुए सुलेखा से कहा 
सुलेखा ऊपर ही ऊपर अपने पोते की बातों को हंसते हुए सुन रही थी लेकिन भीतर ही भीतर मन दुख और रुदन से भरा हुआ था
बेटे का आज प्रमोशन हुआ और कल पार्टी भी है लेकिन मुझे बताने की सुध भी नहीं आई किसी को,, अरे आशीर्वाद ही मिलता मेरा
दादी मैं जा रहा हूं खेलने
हां बेटा तू जा ,मैं भी आराम करूंगी
सुलेखा भी जैसे थक के बोली  
थक ही तो गई थी वह हर चीज से जैसे 
आंखें मूंदी तो नन्हा राजन सामने आ खड़ा हुआ 
अपने स्कूल की हर बात बताते हुए ,यही वह बेटा था जो दिन भर बोल बोल के उसकी जान खा जाता था और आज दो बातें भी बहुत सोच कर बोलता है और वह इंतजार करती रहती है कि उसका वही बचपन वाला बेटा फिर से सामने आ जाए 
मां!
दरवाजे पर राजन की दस्तक ने उसे यादों से जगा दिया,,
सो गई क्या?
अरे नहीं बेटा 
सुलेखा पुलक के बोली 
आखिर आ ही गया बताने ,मां हूं बिना बताए थोड़ी ना रह सकता है 
सुना तेरा प्रमोशन हो गया 
हां मां कल कागज मिल गया 
राजन ने पैर छूते हुए कहा 
सुलेखा को अब कोई शिकायत याद नहीं आ रही थी राजन के पैर छूते ही
अच्छा मां आराम करो, मैं बाद में आता हूं
राजन उठकर दरवाजे तक गया और रुक कर बोला 
मां कल एक छोटी सी पार्टी रखी है ऑफिस के लोगो की,, 
सुलेखा मुस्कुरा उठी 
अब वह शायद उसे सबसे मिलवाने को कहेगा 
मां तुम चाहो तो जीजी के यहां जा सकती हो ,थोड़ा शोर शराबा होगा देर तक ,तुम्हारी नींद खराब हो सकती है 
राजन ने थोड़ा हिचकते हुए कहा 
नहीं बेटा मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी ,मैं कमरा बंद करके आराम से सो जाऊंगी 
राजन ने चैन की सांस ली,, जैसे जो वह कह नहीं पा रहा था, उसने कह दिया हो,और बाहर निकल गया
सुलेखा का रुदन अब आंखों से बह चला था
पति के जाने के बाद अपने प्रति सब कुछ भूल कर कितनी मुश्किल‌ से उसने राजन को कैसे पढ़ाया लिखाया वहीं जानती है 
बचपन की हर छोटी से छोटी बात बताने वाला राजन कब उससे इतना दूर हो गया कि आज अपनी खुशियों में भी शामिल नहीं कर पा रहा था ,,उसे पता ही नहीं चला 
अगले दिन शाम को घर में अलग ही रौनक थी
दादी बहुत सारे पकवान बने हैं
गोलू जासूस बना सब खबरें दे रहा था और हां दादी आपकी मनपसंद रबड़ी भी आई है 
नन्हे गोलू को भी उसकी पसंद पता थी 
सुलेखा को रबड़ी बहुत प्रिय थी,, उसे याद आया कि कैसे वो बचपन में घर के सामने वाले काका की दुकान से लेकर गलियों में घूम घूम कर खाती थी
लेकिन अब सुलेखा जानती थी कि मीठा खाना मतलब घर में क्लेश को दावत देना है ,जब-जब थोड़ी सी भी कुछ मिठाई खाई है ,बहु चीख के पूरा घर सर पर उठा लेती है जैसे वह बहुत परवाह करती हो उसकी 
दादी तुम खाओगी रबड़ी?
क्या मेहमान चले गए गोलू ?
हां दादी ,,बस थोड़े बचे हैं 
ले आ
सुलेखा रबड़ी का स्वाद अपने होठों पर महसूस कर पा रही थी 
कटोरी उठाकर जैसे ही वह मुंह के पास लाई 
छन्न !!!
हाथ से कटोरी दूर फेंक दी गई ,
मीठा माना है लेकिन जुबान पर काबू नहीं,
बहू ने चिल्ला कर कहा ,,चाहती हो कि बीमार पड़ें और लोग कहें कि बेटे बहु ने देखभाल नहीं की,,
लोग खुले दरवाजे से देख रहे थे,, उसकी परवाह किए बिना ही वह बोलते जा रही थी 
और सुलेखा शर्मसार होकर हतप्रभ सी बस बैठी ही रही,, बहु गोलू को घसीटते हुए बाहर ले गई 
रात सुलेख की आंखों में नींद नहीं रुकी 
जीवन जीने का कोई उद्देश्य अब उसे नजर नहीं आ रहा था 
सच है कि बूढ़ा बच्चा समान हो जाता है ,क्या हो जाता अगर वह ना खाती तो  ,,लेकिन इतनी मीठे से वह मर भी तो नहीं जा रही थी 
सारा दुख, दर्द बनकर सुलेखा के सीने में उतर आया
उसने बेचैनी से इधर-उधर देखा ,,पलंग पर जरा सी रबड़ी गिरी पड़ी हुई थी ,,शायद कटोरी फेंकते समय गिर गई थी,, उसने अपनी उंगली से वह रबड़ी उठाई और जीभ पर रखी और असीम तृप्ति का अनुभव लेकर गहरी सांस लेकर लेट गई ,,,
...
राजन के घर पर आज फिर भीड़ थी 
मां की तेरहवीं थी 
बड़े अच्छे से भोज का आयोजन हुआ था 
सब गुण गाते थक नहीं रहे थे 
बच्चे हो तो ऐसे 
कोई बचा नहीं जिसे खाया ना हो 
भोजन भी एकदम स्वादिष्ट था ,,खास तौर पर रबड़ी,, जिसकी सब प्रशंसा कर रहे थे
" रबड़ी बहुत पसंद थी मां को ,,सब ने खाया, मांजी तृप्त हो गई होंगी "
बहू ने आंसू पोंछते हुए कहा।

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