Friday, 11 December 2015

अनचाहा एहसास

आंटी मिठाई दे दो ...
आज दीवाली है ना ....छोटी बहन को खिलाना है
अच्छा धंधा है माँ-बाप का भीख मंगवाने का ....पलटने लगी मैं
माँ नही है ....
एक बोझ सा उभर आया ....एक मिठाई की तो बात थी
कुछ काम है ?
ये कूड़ा डाल आ ....बीस रुपए दे दिए ...उस बोझ को दबाने की जल्दी थी शायद
अकस्मात सुबह वाली लड़की पर नजर पड़ी ...पास ही खाना था ...बहन को मिठाई खिला रही थी ...याद आया कि आज कूड़े में खराब हो रही उसी मिठाई का डब्बा डाला था
दबा बोझ अब दर्द देने लगा था

(आज सिरहाने के लिए )
1 कहानी 101 शब्द 

संयोग

कुछ कहानियाँ ....जो लिखी है मैंने 1 कहानी 101 शब्द में...
और शुक्रिया AajSirhaane का जिनसे लिखने की प्रेरणा और प्रोत्साहन मिला

1) संयोग
बेकार का सामान है ये माँ, इसे बाहर क्यों नही निकाल देती
पर मेरे लिए तो निशानी है बेटा ....
बस बुदबुदाकर ही रह गई माँ ....आँखों की नमी छुपाते हुए
मेरे मरने के बाद तुम बाहर कर सकते हो ....थोड़ा दृढ़ शब्दों में बस इतना ही कह पाई
.....क्या करना है इस सामान का
माँ के खालीपन का एहसास कराती जिंदगी और घर
प्रश्न इंतजार कर रहा था जवाब का
कुछ नही , माँ की निशानी है ये सब ....डबडबाई आँखों से देखते हुए कहा उसने
सामान वही था ...घर वही था ...बस संयोग से लोग बदल गये थे

Wednesday, 7 October 2015

लिखना है तुम्हें ...

एक बार लिखना है तुम्हें..पन्नो पर ...
अनदेखे-अनजाने ही सही तुम
तो क्या हुआ ..
जो मिले नही कभी हम
यूँ लगता है ..हर पल साथ है तुम्हारा
सुना नही मैंने कभी तुम्हे
पर कानों में तुम कुछ कह कर चले जाते हो अक्सर
और मैं हँस पड़ती हूँ खिलखिलाकर ...
पास नही हो मेरे तुम
पर दुनिया जाने क्यों लगने लगी है रोशन ...
हर चीज अच्छी लगने लगी है
बेवजह की बातें भी अब प्यारी लगने लगी हैं ...
कोई ख्वाहिश भी नही है कि मिलें हम
सिर्फ इस एक एहसास को जीना चाहती हूँ...
बस पन्नों पर तुम्हे छूना चाहती हूँ...

Sunday, 4 October 2015

और तुम चले गये....

अभी तो बातें थी बहुत ...
जो मुझे कहनी थी
और शायद कुछ बाते तुम्हारी
जो मुझे भी सुननी थी
अभी तो सिलसिले शुरू ही हुए थे...
और तुम चले गये...

अभी तो हाथ थाम कर
चाँद देखना था
और आसमां से लटके तारो से
कोई ख्वाब बुनना था
अभी तो शाम आई ही थी...
और तुम चले गये...

अभी तो सपनो का
आशियाना बनाना था
और अपने अरमानो से रोशन
आँगन सजाना था
अभी तो सफर शुरू ही हुआ था...
और तुम चले गये ...

अभी तो बारिशों का
मौसम भी बचा था
इन खिले फूलों के संग
हमें भी तो भीगना था
अभी तो हवाएँ खुश्बू लाई ही थी...
और तुम चले गये...

Friday, 25 September 2015

कभी तो....

वक्त के बंधन में क्या मिलें,
कभी समय के परे भी तो मिलो...

रस्मो-रिवाजों की पथरीली ज़मीं है,
कभी उड़ने के लिए आसमान भी तो बनो...

उजालो में तो हर शख्स साथ देता है,
कभी अंधेरों की राह में रोशनी भी तो बनो...

हर शख्स सुनता है आवाज़ों को,
कभी मेरी खामोशियों को भी तो सुनो...

दो जहाँ की करते हैं सब बातें,
कभी सितारों के आगे भी तो चलो...

Thursday, 24 September 2015

लिखते तो बचपन में थे ...

अब तो सिर्फ पन्ने भरते हैं ...लिखते तो बचपन में थे
आड़ी-तिरछी रेखाएँ ...उल्टे-सीधे शब्द  ..
हर गोल चीज सूरज बन जाती थी ...पहाड़ों से नदी बह जाती थी ..
मंज़िल तक पहुँचना तब कितना था आसान ..हर टेढ़े-मेढ़े रास्ते पार हो जाते थे
लिखने की कोई वजह ही नही थी ....लिखना खुद में एक वजह था
रंगीन दुनिया थी.....हर रंग की अपनी कहानी थी
फैले रहते थे बेतरतीबी से पूरे पन्ने पर ...पंक्तियों में सजना शायद पसंद ही नही था ....
उस बिखराव में कितनी खूबसूरती थी ...भटक गयी है जो आज कहीं ...

Saturday, 19 September 2015

कुछ एहसास ....

एक टूटे सूखे पत्ते का ...
कैसा होता है एहसास
छूट जाता है शाख का भी साथ ....
न आसमां और न ही रहती है जमीं पास ....
हवाओं के रहमो करम ही जीते जाना है
हरे-भरे थे जो कभी .. अब सिकुड़ती-झड़ती जिन्दगी को बिताना


मैं यहीं हूँ..
कुछ एहसास लिए
दूरियों में नजदीकियों का..
खामोशियों में बातों का ..

मैं यहीं हूँ...
कुछ एहसास लिए
कदमों में हौसलों का...
बेनाम रिश्तों में प्यार का

मैं यहीं हूँ....
कुछ एहसास लिए
धूप में छाँव का ...
सर्द जज़्बातों में तपन का ...

मैं यहीं हूँ...
कुछ एहसास लिए
आँसुओं में मुस्कुराहट का ...
वीरान में बहार का...

मैं यहीं हूँ...
कुछ एहसास लिए

Friday, 18 September 2015

जंगली फूल

शायद तुमने छुआ है दिल को .....
नही तो बेवजह ही नम नही होता दिल मे छुपा वो कोना
और न ही खिलते कुछ खुबसूरत से जंगली फूल ...
फैलते जाते हैं जो बेतरतीबी से
जिन्हे ज्यादा प्यार-दुलार की जरूरत नही ....बस काफी है जमीं का भीग जाना ही ..
खंडहर सा वीरान पड़ा रहता है बरसों तक कोई दिल
जिसकी तरफ नज़र पड़ती ही नही किसी की...
फिर अचानक ही खिल जाते हैं कुछ फूल
और लगने लगता है कि
शायद अभी भी बचा है कुछ ...
शायद कुछ मौसम बचे हैं अभी ...




Monday, 14 September 2015

आँखों में इतने अनकहे अफसाने
मगर होठों पे खामोशी लिए फिरते हो ...
ढूँढती हैं निगाहें तुम्हारी मुझे
फिर मिलने पर नज़र क्यों चुराते हो ...
यूँ तो कोई बात नही करते
फिर भी कितना झूठ बोलते हो ....

हाइकु

ढलती धूप
निखराती ही जाए
रंग शाम के

धूप जो पर
समेटे तो शाम के
पंछी भी उड़ें 

खुश्बू शाम की .....

शाम की भीनी-भीनी खुश्बू से,
रात और दिन हैं महके से..

आकाश की आँखों के कोने से
दिन की बूँदे लुढ़क गई ....
भावनाओं में बहने लगी है 
कुछ शाम भी....

तमाम इंतजार मुस्कराते हैं 
जब हथेली में मेरी ....
तुम्हारी रखी हुई एक शाम पाते हैं 

तू धूप की तरह बस छू के न गुज़रे, 
किसी शाम की तरह रूह में भी उतर जाए ...

रोशनी के पन्ने पलटता रहा दिन, 
शाम कोई कहानी में ढलती रही ...

समुंदर के पानी पर,धूप ने लिखे थे जो किस्से तमाम ...
मिटा के उन लहरों पर शाम लिखेगी अब चाँद का नाम ..

यूँ तो जुदा हैं ...दिन और रात की राहें
पर एक पल के लिए ही सही ..करीब ले ही आती हैं शामें

धीर से सूरज को कोने में खिसका कर...
अपने रंग बिखेर देना ...
शाम की पुरानी आदत है 

कभी-कभी शाम भी खर्च हो जाती है ....दिन को बेहतर बनाने में







Saturday, 12 September 2015

तारों का आँगन ..

ये तारे इतने टिमटिमाते क्यों हैं...
न न .... नही चाहिए जवाब वो साइंस का..नीरस सा
बताइए कुछ रहस्यमयी या रोमांटिक सा..
शायद बीते वक्त के किस्से तारों में छुप जातें हैं तभी तो रात के अंधेरे अनसुनी कहानियों को सपनो में सुनाने आते हैं
या फिर ये उनकी है मुस्कान कोई ..
वो गाना है ना..चाँद खिला वो तारे हँसे..
एक प्यारी सी मुस्कुराहट .. जिससे आकर्षित होकर चाँद खींचा चला आता है
क्या आपने देखा है कभी छत पर लेट कर ...
घंटों तारों को एकटक ...
गुलज़ार साहब का वो गाना तो सुना ही होगा "तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए"...
अगर इसको अनुभव नही किया है तो सच मानिए..आपने बहुत कुछ छोड़ दिया है.....
वैसे आप क्या सोचते हैं ?

Friday, 11 September 2015

मेरी डायरी


मेरी डायरी ...
बंद पड़ी है पता नही कब से ..अलमारी के अंदर 
खाली-खाली पन्नो के खाली-खाली दिन 
बस पलटते जाते है ..बेमतलब से 
समझ नही पा रही है वो कि 
जिन बातों को अपने सीने में छुपाती थी 
उन्ही बातों को अब छुपाया जा रहा है क्यों उससे ही
जब भी खुलती है अलमारी ,
मैं नज़रें चुराती हूँ 
पता नही किस ग्लानि से ...
और वो भी देखती है, 
पता नही किस उम्मीद से ...
कि शायद आज वो मेरे हाथो मे होगी 
और कही जाएँगी कुछ बातें उससे ...
तरसती रहती है सुनने को वो 
जो मुझसे ....

Saturday, 22 August 2015

दुपहरियाँ ...

खुशनुमा दुपहरियाँ....
बड़ी याद आती हैं अक्सर ...सन्नाटे की दोपहर में
मन करता है कि लगा दूँ वो सारी दोपहरें किसी एल्बम में..
और देखा करूँ
कुछ उन पलों को याद करूँ और इस लंबे सन्नाटे को काटूँ
तुम्हारे पास भी तो होता होगा कभी दोपहर का सन्नाटा और..
कुछ अकेलापन सा ...
अगर तुम्हे चाहिए तो भेज दूँगी मैं
वो खुशनुमा दोपहरें ...
पोस्ट करके ....

Thursday, 6 August 2015

खामोशी ...ख्वाब ....ख्याल ...और रातें

रात की सीढ़ी पर चढ़कर ...
आसमां से कुछ सपने उतारने हैं

दिन के कितने ही सवालों के...
खामोश से जवाब हैं रातों के

ख्वाबों की स्याही है...
रात कुछ लिखेगी
सुबह सौदे करेगी

दिन भर जमाने से उलझना ..
मगर रात.. अपने दिल को भी समझना

तारों के जाल में उलझ कर रह गये सपने ...
अब चाँद तक पहुंच कर कौन जाएगा छुड़ाने

चंद ख्वाहिशें जिन्हे दिन ने ठुकरा दिया ...
अब रात पनाह देगी उन्हें ख्वाबों के घरौंदों में

सपनो की खिड़कियों के पर्दे सरकने लगते हैं...
जब चाँद रात की गलियों से गुज़रता है


Monday, 3 August 2015

मैं बुद्ध नही ....

त्याग दिया...
संसार ...
गौतम ने,
सत्य के लिए ...
पर मैं....
नही छोड़ सकती ...
यही रहकर
तलाशना होगा
मुझे ...
शायद पड़ा हो
कोई सत्य ...
इन्ही उत्तरदायित्वों के तले ...

Tuesday, 28 April 2015

जो भी आया

यूँ तो जो भी आया...
लिख के गया
हर रिश्ते ने 
अपनी मनमर्जी से भरा...
फिर भी ..
खाली सी है जिन्दगी
और कोरे से दिन
खुद भरूँ अपने शब्दों से..
कभी सोचा नही
उम्मीदें थी उड़ने को बेताब,
पर मिला आसमां नही..
मेरी डोर ने,
हाथ किसी और का पाया
#SShikha

Saturday, 21 March 2015

तलाश

बरामदें में रख के मिट्टी के बर्तन में पानी....
गौरैया में रिश्ते तलाश रहा मन...
अब कहाँ हैं आँगन....और कहाँ है अपनापन

Thursday, 26 February 2015

सहेली. .

है मेरी एक सहेली. ...
कुछ सुलझी...कुछ पहेली
हरपल साथ,
चाहे गम हो या खुशी की बात...
उसके मन की करूँ तो खुश हो जाए,
जो न करूँ तो उदास हो जाए
कभी उसका ख्याल रखूँ...कभी
अनदेखा कर दूँ...
बैठी रहती है मन के कोने में,
एक छोटी लड़की. ..
है मेरी एक सहेली. ..
कुछ सुलझी..कुछ पहेली. .

कैसा अजब ये मन है....

भावनाओं के जंगल में...
निस्तब्धता पसारे,
सूनापन है...
हैं नही किसी के पास...
फिर भी तलाश रहा..
हर दूसरे के पास,
अपनापन है....
उम्मीदों के रास्ते. ..
ख्वाबों की मंजिल तक
पहुँचने का पागलपन है...
कैसा अजब ये मन है....

सपने. ..

चाँद-तारों की छत तले...
चंद सपने टहलने चले

Monday, 23 February 2015

रात


दिन की धूप में जिन ख्वाबों की चादर फट जाती है... रात उन्हें फिर से सिलने बैठ जाती है...