अब तो सिर्फ पन्ने भरते हैं ...लिखते तो बचपन में थे
आड़ी-तिरछी रेखाएँ ...उल्टे-सीधे शब्द ..
हर गोल चीज सूरज बन जाती थी ...पहाड़ों से नदी बह जाती थी ..
मंज़िल तक पहुँचना तब कितना था आसान ..हर टेढ़े-मेढ़े रास्ते पार हो जाते थे
लिखने की कोई वजह ही नही थी ....लिखना खुद में एक वजह था
रंगीन दुनिया थी.....हर रंग की अपनी कहानी थी
फैले रहते थे बेतरतीबी से पूरे पन्ने पर ...पंक्तियों में सजना शायद पसंद ही नही था ....
उस बिखराव में कितनी खूबसूरती थी ...भटक गयी है जो आज कहीं ...
कैनवस सी जिन्दगी. ..और इस पर अपने रंग-बिरंगे ख्यालों से कुछ तस्वीरें उभारने की कोशिश
Thursday, 24 September 2015
लिखते तो बचपन में थे ...
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Yahaan taaruf Shikha ji se hai ya Gulzar sahib se? :)..More power to your pen :)
ReplyDeleteMesmerised... superb and beautiful.
ReplyDeleteMesmerised... superb and beautiful.
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