Tuesday, 26 July 2016

शाम होते जल जाते हैं आँखों में उम्मीदों के दिए

सुलझी हुई राहों को उलझाने के लिए आ जाता है
वो मुझे फिर से बिखराने के लिए आ जाता है

साहिल पर बिखरी रहती हैं जो यहाँ रेत सी ख़्वाहिशें
सागर कोई फिर इन्हे बहाने के लिए आ जाता है

बहुत अंधेरें फैलते हैं जब ख़्वाबों की राह के दरम्यान
चाँद खिड़की से झाँककर रोशनी के लिए आ जाता है

शाम होते जल जाते हैं आँखों में उम्मीदों के दिए
कोई उस सूने घर दस्तक के लिए आ जाता है

जब भी लगा कि पढ़ ली ज़िंदगी की किताब पूरी
सामने एक नया पन्ना पढ़ने के लिए आ जाता है

उजाले अंधेरों में ढलने लगे हैं

उजाले अंधेरों में ढलने लगे हैं
ख़्वाब आँखों में पलने लगे हैं

ज़मीं ही काफी नही थी यहाँ
लोग चाँद पर चलने लगे हैं

एक उम्र धूप का सफ़र करके
रास्ते भी अब बदलने लगे हैं

चुभते हैं तमाम रोशनी के ठिकाने
चमकते सितारे भी जलने लगे हैं

आँखें कह जाती हैं सारा सच
लफ़्ज़ झूठ पर पलने लगे हैं 

Sunday, 19 June 2016

घर

माँ-पापा के जाने के बाद कुछ नही रहा घर में घर जैसा.. बस एक चादर जो पड़ी है बिखरे सामान पर और एक ..बिखरे एहसासो पर
जब भी हम जाते हैं उस घर में, तो हटा देते हैं चादर सामान की और दबाए एहसासों की भी..
और फिर चमक आ जाती है घर में ..लगता ही नही कि जैसे वहाँ कोई रहता ही नही ..वही चहल-पहल वही शोर-शराबा वही रौनक जो कभी हुआ करती थी
पुराने एल्बम निकल आते हैं, उनसे जुड़ी यादों के किस्से सुनाए जाते हैं और कभी-कभी चुपके से कोई वो पुरानी तस्वीर छुपाने की कोशिश भी की जाती है जिसमें हम अजीब से लग रहे होते हैं ताकि हमारे बच्चों को दिखाकर मजाक न होने लगे
और पुराने काॅमिक्स चाचा चौधरी, चंपक, नंदन, वेताल,मैनड्रेक,बहादुर , राजन-इकबाल के जासूसी नाॅवेल और भी न जाने क्या-क्या सारे निकल आते हैं ..बंद पड़े रहते हैं जो बक्से में साल भर... जैसे निकलते थे पहले गर्मी की छुट्टियों में ..इतनी किताबें होती थी कि हम उसमें लाइब्रेरी भी खोल लेते थे , पढ़ाई तो शायद ही कभी रात के 2 बजे तक की हो, हाँ काॅमिक्स जरूर छुट्टियों में ऐसे पढ़ी जाती थी जैसे उसका कल एक्जाम होने वाला हो
और दिख जाते हैं कभी-कभी वो छोटे कपड़े भी बचपन के जो माँ अपने हाथों से सिलती थी और बरबस ही आँखें नम कर देते हैं , दिल में एक धक्का सा महसूस होता है कि अब ऐसा कुछ नही होने वाला ..
मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कि इतने सालों तक घर बंद रहने के बावजूद भी जब हम सब इकट्ठा होते है तो ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वहाँ हमेशा ही कोई रहता है , वो घर जो धूल में लिपटा पड़ा था चमचमाने लगता है जैसे ऐसा ही रहता हो हमेशा ..पर ये बात सिर्फ मुझे ही नही हम सब भाई-बहनों को महसूस होती थी इसका पता मुझे जब चला..हैरान रह गई मैं
हम सब अपनी जिंदगी में बहुत आगे बढ़ गये , व्यस्त हो गये फिर भी हम साल में एक बार जरूर जाते हैं उस घर और अपने एहसासों पर पड़ी चादर को हटाने ।

Saturday, 4 June 2016

दूसरा गौतम

क्या लकीरें हैं हाथ की  ,बहुत नाम करेगा
धन्यवाद गुरूजी, चिंता दूर कर दी आपने
बहुत बड़ा ज्ञानी-ध्यानी बनेगा ये
क्या!! नही..हम नही बनने देंगे इसे दूसरा गौतम
बचपन परिवार की निगरानी में..
सुविधाएँ सारी, पर साथी कोई नही ..
लेकिन उसे चिंता नही प्रकृति और किताबें साथ थे उसके
समय के साथ बेफिक्र हुआ परिवार , शादी की भी तैयारी होने लगी
लेकिन एक दिन एक खत ..
"माँ पिताजी , मेरी मंज़िल कुछ और ही है,इन सब के लिए नही बना हूँ , मैं भी दूसरा गौतम नही बनना चाहता बस इसलिए शादी से पहले ही जा रहा हूँ "
- बेटा
( आज सिरहाने के लिए )

Monday, 16 May 2016

सूना सपना

"खुशनुमा मौसम होगा ..बस हम-तुम और और हाँ शैम्पेन भी .. एक ही ग्लास में पियेंगें हम एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए ..
पर मैं कैसे देख सकती हूँ  ...
मेरी नज़र से ..."
सोचते-सोचते रिया की आँखें फिर भर आईं ..अंकित अक्सर कहता था ये..
ये सब फिर सजा रखा है तुमने ..कमरे को देखकर पूजा बोली रूममेट कम मम्मी ज़्यादा थी वो
ओहो रिया ज़िदगी में आगे बढ़ो, गुजरे कल की नजर से मत देखो आज को..
कैसे न देखूँ ..नजर तो उसी की है
रिया ने अंकित की हार चढ़ी तस्वीर को हाथों में उठाते हुए कहा
( आज सिरहाने के लिए )

Saturday, 16 April 2016

निशानी


एक अजीब सी खामोशी थी घर में, उदासी भरी ...जिसे कोई भी नही चाहता ...
अचानक भाई माँ का संदूक उठा कर लाए ...धीरे-धीरे सब सामान निकालना शुरू किए ..
जिसको जो चाहिए ले सकता है ..बोले
और सामान बँटने लगा उनकी निशानी के रूप में..
तुम कुछ नही लोगी ? भाई ने पूछा मुझसे..
तुम लेने में कोई भी बेवकूफी मत करना ..पति ने फुसफुसा के कहा
"बिलकुल नही"...सोचते हुए मैंने माँ की एक पुरानी टूटी ऐनक निकाल ली
(आज सिरहाने "1 कहानी 101 शब्द " के लिए)

Saturday, 2 April 2016

तुमने सुना है कभी रात को कुछ कहते हुए ...

पत्ते सपनों के ..
कुछ खिले, कुछ मुरझाए ,
और कुछ नीचे पड़े हुए ...

एक उम्र धूप का सफ़र तय करके ...
सँवरते हैं ख़्वाब रात के 

रात का ज़रा सा काजल क्या बिखरा...
तमाम सपने टकटकी लगाए देखने लगे

आओ कुछ ख़्वाब बुने इस रात के वास्ते ..
कि सफर कटेगा आराम से 

सपनों की खिड़कियों के पर्दे सरकने लगते हैं ...
जब चाँद रात की गलियों से गुज़रता है 

उलझी उलझी रात की लटों को ...
सँवारने चले हैं सपने मेरे

इन ख़्वाबों की चाहत में...
अंधेरे भी रास आने लगे हैं हमें